Friday, January 8, 2016

अलग-अलग छोटे-छोटे कुनबों से निकलकर, एक छत के नीचे कब आएंगे सारे चिकित्सक ???

अलग-अलग छोटे-छोटे  कुनबों से निकलकर, एक छत के नीचे कब आएंगे सारे चिकित्सक ???

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की कल शाम 8 बजे होटल मानसिंह में एक गोष्ठी होने जा रही है. ऐसी गोष्ठियां चिकित्सकों को नवीनतम जानकारियाँ उपलब्ध कराती हैं, जिनमे नामी गिरामी विशेषज्ञों की वार्ताएं होती है व अंत में प्रश्नोत्तर काल में डॉक्टरस अपनी जिज्ञासा भी शांत करते हैं. साथ ही आपस में मेलजोल भी बना रहता है.
लेकिन दुर्भाग्यवश छोटे छोटे एसोसिएशन बना कर इन्होने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का कृत्य किया है. कल के दिन ही होटल दाता-इन में अजमेर ओर्थपेडीक फोरम ने भी जयपुर के डॉक्टर्स की एक वार्ता रख दी है. ये फोरम न तो रजिस्टर्ड है और न ही इसकी कोई बुलंद सामूहिक आवाज़ है. हालांकि हर विशेषज्ञों की अपने विषय में वार्ताएं होना और अपडेट होना आवश्यक है लेकिन पैरेंट बॉडी IMA (Indian Medical Association) को नज़र अंदाज़ करना कहाँ की समझदारी है ??
ये बात सर्व विदित है की IMA एक राष्ट्रिय  स्तर पर ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का  सर्वोच्च मान्यता प्राप्त चिकित्सा संगठन है. जो मेडिकल से सम्बंधित मुद्दों को पुर जोर तरीके से सरकार के सामने रखता है.  
आई.एम्.ऐ., अजमेर इकाई को सभी चिकित्सकों को इसमें जोड़ने का भरपूर प्रयास करना चाहिए. अन्य सुपर या सब स्पेशलिटी संगठनों को भी आई.एम्.ऐ, अजमेर इकाई से बात चीत के पश्चात ही कोई वार्ता आयोजित करनी चाहिए  तथा उनके प्रेसिडेंट व सचिव को इनमें भी आमंत्रित करना चाहिए.
IMA के निवर्तमान प्रेसिडेंट डॉ प्रोफ़ेसर मार्थंडे हैं जो की दक्षिण के नामी न्यूरो सर्जन हैं. व वर्तमान में जयपुर के डॉ अग्रवाल हैं जो नामी फिजिशियन हैं. याने की सुपर स्पेशलिस्ट होकर भी मेम्बर बनना व प्रेसिडेंट जैसी जिम्मेदारी संभालना. ये उदाहरण उन लोगों के लिए मार्ग दर्शक स्वरुप हैं जो स्वयं को स्पेशलिस्ट या सुपर समझ कर इससे ना जुडने की भूल कर बैठे हैं.
अभी हाल ही पुष्कर रोड स्थित मित्तल अस्पताल में जो हंगामा व डॉ पोखरना के साथ जो बदतमीज़ी हुई उस को शायद सब चिकित्सक भूल गए हैं. अभी भी इन घटनाओं से सबक लेकर यदि सब एक छत के नीचे आजायें तो संगठित होकर इन असामाजिक तत्वों व डॉक्टरों के प्रति अमानवीय व्यवहार का मुकाबला किया जा सकता है, वरना अपनी-अपनी खिचड़ी तो अब तक सभी डॉक्टर पकाते ही आ रहे हैं. यदि सबको एक होना है तो उस  छत का नाम IMA है, जिसके नीचे बैठ कर ही आप अपना और अपने शिशु चिकित्सकों का भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं. डॉ. अशोक मित्तल!

०८ जनवरी २०१५, शुक्रवार! 

Tuesday, December 29, 2015

डोक्टर संवेदन शील होते हैं या नहीं होते ???



डॉक्टर संवेदन शील होते हैं या नहीं होते ???
21 दिसम्बर, 2015 की शाम को जब मैं मुंबई से लौट रहा था तो प्लेन में बेठने के बाद वो एक घंटे तक रनवे पे ही खड़ा रहा, फिर डेढ़ घंटे की उड़ान. पूरे ढाई घंटे नितांत अकेला रहा. उन तन्हाई के पलों में भागचंद भैया के बारे में ही सोच रहा था जिन्हें मिलने, सम्हालने मैं बोरीवली के करुणा हॉस्पिटल गया था. पहले से ही  मैं  विचलित था ये सोच कर की 15 दिन पहले एक मामूली पेट दर्द की शिकायत का निदान एक  आखरी स्टेज के कैंसर के रूप में हुआ !! आई सी यु में उनके साथ दोनों दिन करीब 6 से 7 घंटे बिताये. उनके बेड सोर भी हो गए थे, आँतों से खून के रिसाव के कारण बहुत ही क्षीण हो गए थे. बोलने पर सांस फूल रही थी और ऊपर लगा मोनिटर टौं टौं करने लगता था. बहुत खुश हुए मुझे देखकर. कई सारी बाते की, जीवन से व अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट थे.
अस्पताल की एडमिन सिस्टर रोशेल भी मेरे साथ गयी और मुझे अस्पताल के बारे में कई बातें भी बताई. मेरे लिए वो गर्व का कारण है क्योंकि अजमेर में संत फ्रांसिस अस्पताल में मेरे साथ ऑपरेशन थिएटर में वर्ष २००० से पूर्व एक प्रशिक्षु के रूप में कार्य कर चुकी थी. उसने भय्या की सार संभाल का भी मुझे भरोसा दिलाया.
ये सब सोचते सोचते टेक ऑफ के समय मेरी आँखों से आंसू बहने लगे. बचपन में साथ बिताये एक एक पल याद आने लगे. चर्च गेट स्टेशन के सामने वाले एशियाटिक स्टोर से भैया अक्सर बहुत ही बड़ी बड़ी साइज़ के चीकू, सीताफल, अमरुद आदि मुझे दिलाते थे.
मैं इस शाश्वत सत्य से भली भांति वाकिफ हूँ की सबको एक दिन जाना है. इस ओर से मैं चिंतित नहीं था, बस यही दुआ कर रहा था की “हे इश्वर भले ही एक आध महिना उनकी जिंदगी के कम करले, पर उन्हें व परिवार के सदस्यों को पीड़ा मत देना”. इतने शांत स्वाभाव वाले, सीधे सादे इंसान को सादगी और शांति से ही अपनी शरण में ले जाना. यही दुआ में अपनी चाची के लिए भी रोजाना करता था जो छ माह पूर्व ही हमें छोड़ कर गई है.
मुझे पता ही नहीं चला की कब ढाई घंटे बीत गए. विचारों का तांटा टूटा और जयपुर पहुँच कर अन्नू के घर चला गया. मन में ये द्वन्द चल रहा था की डॉक्टर बनने के बाद जीवन भर एक दर्द से दुसरे दर्द के उपचार में और एक मरीज की समस्या से दुसरे मरीज की समस्या सुलझाने में ही दिन बीतते गए. यानी पुरे जीवन में दर्द से दर्द तक का सफ़र करते रहे. हर मरीज के ऑपरेशन से पूर्व थिएटर में “हे हमारे पिता तू जो स्वर्ग में है ...” प्रार्थना कर के ही चाकू हाथ में लिया.
ये विचार सिर्फ खाली पलों में ही आते हैं, जब किसी रोगी का इलाज़ करते हैं, तब भावुकता नहीं होती मन में, वरना क्या मैं अपनी मम्मी का कूल्हे की हड्डी का ऑपरेशन कर पाता?? जबकि ऑपरेशन टेबल  पर वो मिनटों तक नीली भी पड गई थी और उस वक़्त मैं यमदूत से भी (विचारों से) खूब झगडा था, और कुछ और वर्षों के जीवन  की मोहलत उससे मांगी थी. जिस में मुझे सफलता भी मिली.
याने!! कुल मिला कर एक सीमा के बाद एक चिकित्सक को भी प्रार्थना, दुआओं के द्वारा ऊपर वाले की मर्जी पर ही सब कुछ समर्पित करना होता है.
इन सब विचारों का मैंने आज 29 दिसम्बर, 2015 तक गहन विश्लेषण किया और अंत में मैंने अपने आपको एक भावुक इंसान होने के बजाय एक मजबूत और संवेदनशील व्यक्तित्व का धनी पाया. तभी तो इश्वर ने बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी के कार्य सोंपे और उन्हें सफलता पूर्वक पूरा भी करवाया.

डॉ. अशोक मित्तल 29 दिसम्बर 2015

Thursday, December 3, 2015

पोस्टमोर्टम रिपोर्ट ने दिखाया आइना!
पुष्कर रोड स्थित घीसीबाई मित्तल अस्पताल में पिछले हफ्ते हुई मौत का सही समय जे.एल.एन. अस्पताल द्वारा  जारी पोस्टमोर्टम रिपोर्ट के अनुसार लगभग वही आया है जो परिज़नों को बताया गया था. याने चार दिन पहले हुई मौत एक सफ़ेद झूठ साबित हुई. इस सारे हंगामे के पीछे कुछ और कारण था जो जांच का विषय हो सकता है.
वैसे भी इतने रिस्की ऑपरेशन जिनमें व्यक्ति मौत के कगार पे खडा हो और बाई पास से 98% को जीवन दान मिल जाए, क्या कोई चमत्कार से कम है ??
समुदायों, जातियों, और धार्मिक संगठनों द्वारा इस तरह के अमानवीय प्रदर्शन अस्पतालों में करना कहाँ तक उचित है ये आज के सभ्य समाज को सोचना होगा. क्या अस्पताल किसी धार्मिक स्थल से कम है? जहां पीड़ित मानव की सेवा होती हो, जहाँ हर मरीज व उसके परिजन शांति का, सोहार्द का व सुरक्षा का माहोल चाहते हैं. वहां अन्य मरीजों पर क्या इन प्रदर्शन कारियों को दया नहीं आनी चाहिए?
क्या मरीज़ का धर्म या जाती देख कर चिकित्सक इलाज़ करता है? कभी नहीं. तो फिर क्या अगली इसी तरह की कोई अनचाही घटना हुई तो उस के परिज़न भी अपनी जाती के लोगों को इकठ्ठा करके फिर हंगामा, शोर-शराबा आदि करेंगे  और झूटे ज्ञापन देंगे?
डोक्टरों द्वारा निकाली गयी संगठित व शान्ती-पूर्ण रेली निश्चित ही एक सराहनीय कदम है. वैसे भी शांति के दूत इससे अधिक क्या कर सकते है? हाँ कुछ डोक्टर दबी जुबान में ये कहते भी पाए गए की वो रेली मित्तल अस्पताल द्वारा प्रायोजित या आयोजित थी. इस लिए वे बहिष्कार कर गए. तो क्या इन बहिष्कार करने वालों को भगवान् का दर्जा प्राप्त है जो इनके इलाज़ से कभी किसी मरीज का अनचाहा परिणाम नहीं आता या वे और ऐसे हादसे होने का इंतज़ार कर रहें हैं जिसके लपेटे में वे भी आवें ?? अन्य अस्पतालों व चिकित्सकों को ये नहीं सोचना चाहिए की अमुक की बदनामी होने से हमारा हॉस्पिटल ज्यादा चलने लग जाएगा. वैसे भी डॉक्टरों का समुदाय कई छोटे छोटे धडों में में बंटा हुआ है. IMA, PMPS, FMCTA, RMCTA, IOA, API, सरकारी, प्राइवेट डॉक्टर ऐसोसिएशन जैसे अनगिनत संगठन है जिसकी वजह से कोई एक साझा मंच नहीं है जहां से पीड़ित डॉक्टर अपनी आवाज उठा सके.
समाज व प्रशाशन को भी कड़ाई से उन नियमों का पालन करना चाहिए जिनके अनुसार अस्पतालों में की गई कोई भी क्षति दंडनीय अपराध है.
सभी अलग अलग डोक्टरों के धडों को एक होकर इन वारदातों की सख्त भर्त्सना व विरोध करना चाहिए वरना अगला हादसा किस अस्पताल में होगा व कौन डॉक्टर जेल जायेगा इसका इंतज़ार करना चाहिए.
डॉ. अशोक मित्तल  मेडिकल जर्नलिस्ट dr.ashokmittal.blogpost.g

Saturday, November 28, 2015

क्या परिज़नों के विरोध प्रकट करने का तरीका शांति पूर्ण नहीं हो सकता?



क्या परिज़नों के विरोध प्रकट करने का तरीका शांति पूर्ण नहीं हो सकता?
जिस तरह दो पत्रकार अक्सर एक ही घटना पर भिन्न भिन्न राय देते नज़र आते हैं. जो की कितनी भी विरोधाभासी हो, इसे प्रकट करने का माध्यम शब्द ही होते हैं जो या तो उनकी कलम द्वारा हमें लिखित रूप में पड़ने को मिलते है या रेडियो टीवी द्वारा सुनने को मिलते हैं. इसी तरह दो वकील अपने अपने मुवक्किल के पक्ष में कोर्ट में प्रस्तुत वाद को मौखिक या लिखित रूप में दायर करते हैं, लम्बी लम्बी बहस भी करते हैं, लेकिन हमेशा मर्यादा में रहकर. कभी भी तैश में आना या चिल्ला कर माहोल बिगाड़ना या उत्तेजित हो कर अप-शब्द कहना, हाथापाई जैसी घटना न तो होती हैं और न ही कानूनन इसकी इजाज़त व इसमें ढील दी जाती है.
तो फिर डॉक्टरों व अस्पतालों में ये सब तमाशे क्यों होते हैं रोज़ रोज़? भीड़ इकठ्ठी होना, नारे बाजी, अस्पताल कर्मियों से गाली गलोच, हाथ पाई, थप्पड़, पुलिस केस?? क्या ये सभ्य समाज की निशानी है??
पुष्कर रोड स्थित मित्तल अस्पताल में हाल ही मे हुए हंगामे व डॉक्टर की गिरफ्तारी को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. हो सकता है सम्प्रेषण (Communication) की कमी रही हो. इसमें कोई शक नहीं की ओपन हार्ट सर्जरी के बाद मरीज़ को शुरू के 4 – 6 दिन वेंटिलेटर पर ही रखा जाता है. मृत्यु कब हुई इस का उत्तर भी पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से करीब करीब सटीक पता चल जाता है.
ये भी सर्वथा सत्य है की जिसके परिज़न  की मौत होती है वो परिवार सदमे में, गहरे दुःख व मानसिक अवसाद में डूब जाता है, हम सब की पूर्ण संवेदना है उन के साथ. लेकिन और भी मरीज़ जो वहां उपचार रत हैं, भर्ती हैं क्या वे किसी के माई-बाप, भाई-बहन नहीं, क्या वे हमारे शहर के अपने नहीं या क्या वे मनुष्य नहीं? उनका शांति पूर्ण तरीके से स्वास्थ्य लाभ लेने का हक़ कोई भी कैसे छीन सकता है ?? वो भी हंगामा, गाली गलोच, तोड़ फोड़  या  मार-पीट आदि करके ?? शहर के सभी प्रबुद्ध नागरिकों व संस्थाओं को ऐसी परिस्थिति में सहिष्णुता, ज़िम्मेदारी, धैर्य  व सकारात्मकता का परिचय देते हुए शांति पूर्ण तरीके से समस्याओं का समाधान करना चाहिए.
एक छोटे से शहर में दिल के ऑपरेशन संभव होना इस शहर का सोभाग्य है वरना अजमेर से बड़े शहरों की और भाग भाग कर अपने परिज़नों को हार्ट अटैक पश्चात ले कर जाते हुए, फिर बीच रास्ते से ही उन्हें लौटा कर लाते हुए, कई हादसे आये दिन सुनने में आते रहते थे.
आम आदमी से लेकर कई ख़ास हस्तियाँ जिन्हें इस हार्ट शल्यचिकित्सा का लाभ मिला और आज स्वत्स्थ हैं, जीवित हैं, वे कितने कृतज्ञ होंगे!! इन भावनाओं को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, शब्दों में नहीं समेटा जा सकता. ऐसा जोखिम भरा ऑपरेशन करने वाले, दिल की चीरफाड़ करने वाले डॉक्टर इस विध्या में पारंगत होने में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देते है. और जीवन पर्यंत प्रतिबद्ध रहते हैं.
अस्पताल व मरीज़ के परिज़न दोनों को ही अपनी अपनी बातों, समस्याओं को साथ बैठकर सुलझानी चाहिए. जिससे की किसी भी मरीज, परिजन व अस्पताल को भविष्य में परेशानी न हो व चिकित्सक भी बेख़ौफ़ हो कर पीड़ितों की सेवा कर सके.  २८ नव २०१५ डा. अशोक मित्तल, मेडिकल जौर्नालिस्ट

Thursday, November 26, 2015

अजमेर (स्मार्ट सिटी प्रस्तावित शहर) की यातायात व्यवस्था के क्या कहने !! 6 दिशाओं में हेरात अंगेज़ ड्राइविंग है यहाँ पर।


अजमेर में यातायात व्यवस्था के जो वर्तमान हालात हैं उससे निकल कर लोग-बाग़ किस प्रकार से अपने गंतव्य तक सही सलामत पहुँच जाते हैं, इस प्रश्न  पर यदि गौर  करें  तो दुनिया के बड़े से बड़े ट्रैफिक मैनेजमेंट के धुरंधर भी दातों तले अंगुली दबा लेंगे  । 
इसे निम्न बिंदुओं (कोई एक चौराहा, सड़क आदि )  में  बाँट कर समझने का प्रयास करते हैं।   

१. चौराहों में से शहर का सबसे प्रमुख है - गांधी भवन याने  मदार गेट चौराया।  इस चौराहे पर ट्रेफिक पुलिस भी तैनात रहती है।  सबसे ज्यादा वाहन स्टेशन रोड से पृथ्वीराज मार्ग की तरफ या फिर  पृथ्वीराज मार्ग से स्टेशन रोड की ओर  दौड़ते हैं। जैसे ही एक और  लाल बत्ती  होती है वैसे ही सामने से बत्ती हरी हो जाती है। इस लाल से हरी और हरी से लाल होने के बीच जो ३० से ६० सेकंड का पीली बत्ती का समय होना चाहिए वह बहुत कम है। साथ ही एक तरफ यदि बत्ती लाल है  दूसरी तरफ हरी होने से पहले कम से कम  आधा से एक मिनट तक लाल ही रहनी चाहिए साथ ही पीली बत्ती भी नहीं होनी चाहिए ऐसा भी यहाँ  प्रावधान नहीं है। जिससे की उस दौरान पैदल चालक सड़क पार कर सकें. पैदल यात्री के लिए कोई ट्रैफिक सिग्नल की व्यवस्था नहीं है। न तो  पुलिस वाले ही इन्हे किसी प्रकार से रोकते हैं और ना ही ये पेडल वाहक सड़क पार कर सकें, इसके लिए वाहनों को रोका जाता हैं।  फलस्वरूप पैदल यात्री, साइकिल सवार, रिक्शा सवार आदि बहते ट्रैफिक में से ही सड़क पार करने की हाबड़ - तोबड़ करते हुए आपको दिख जायेंगे।
सड़क के किनारे पटरी तो बिलकुल गायब ही हो गयी है. गांधी भवन की दीवार से चिपक कर भी पेदल यात्री चल पाये तो भगवान का शुक्र मनाता है.
सबसे ज्यादा तकलीफ तो बुजुर्गों व छोटे बच्चों  के साथ वालों को इन हालात में रोड क्रॉस करने में होती है।  
२. गांधी भवन के सामने कार पार्किंग की जगह है जहाँ  8 - 10  कारें कचहरी रोड साइड और इतनी ही स्टेशन रोड वाली साइड पर खड़ी हो सकती है। इस जगह का हाल ये है कि बड़े-बड़े खड्डे, भयंकर बदबू और अनचाहे वाहन व फेरी वालों के अतिक्रमण ने इस जगह का हाल इतना बुरा कर रखा है की वाहनों के पीछे खड़े होकर लोग मॉल -मूत्र का त्याग करते करते रहते हैं। स्मार्ट सिटी का सपना संजोने वालों को ये कटु सत्य पढ़  कर शायद काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़े। लोगों की भी मजबूरी है की ऐसी परिस्थिति  में वो कहाँ जाये। क्या कोई साफ सुथरे शौचालय हैं वहां। मदारगेट के सुलभ शौचालय भी बदबूदार होने से नागरिक खुले में जाना ठीक समझते हैं. 
३. कचहरी रोड पर दोनों ओर वाहन बेतरतीब ढंग से खड़े रहते हैं। जिससे  वाहनों की गति चींटी की चाल की माफिक रहती है ।कोटा कचौरी और पंडित कचोरी खाने वाले तो सड़क का 60%  से 70% हिस्से पर बेतरतीब वाहन छोड़कर ऐसे लपकते हैं जैसे की या तो बरसों बाद खाने को मिली है। 
४. धूआँ और ध्वनि प्रदुषण उन ऊंचाईयों पर पहुँच गया है जहां से सीधे बहरे पन और दमा जैसी घातक बीमारियों की तरफ ही रास्ता जाता है। हरेक को जल्दी है, हर एक को हॉर्न बजाना है, बजाते ही रहना है तथा हाथ का या बत्ती का सिग्नल देकर या बिना दिए ही मुड़ जाना है। 
५.  करीब हर 10 में से 4 वाहन काला और ज़हरीला धुआँ छोड़ते  धड़ल्ले से दौड़ रहे है। ये ज्यादातर ऑटो, सिटी बसें, दूध वाली  सफ़ेद जीपें, सरकारी बसें आदि हैं। शायद पोलूशन कंट्रोल का सर्टिफिकेट इन ज़हरीले धुँआ वाले वेहिकल पर लागू नहीं है। 
यह सर्टिफिकेट उन पर लागु है जो प्राइवेट कारें पहले से ही यूरो3, यूरो4 मॉडल हैं। ये पहले से ही तकनीकी रूप से इतनी ईको- मित्र  बनाई गई हैं कि इनसे प्रदूषण संभव ही नहीं हैं है। फिर भी  इन्हे ही हर ३ से ६ माह में लाइन में लग लग कर यह सर्टिफिकेट लेना होता है।       
६. रीजनल कॉलेज से ज़ी- सिनेमाल ताल एक बहुत ही सुसज्जित डिवाइडर  गया है। इस मार्ग पर यातायात 6 दिशाओं में चलता है। डिवाइडर से सट कर के दोपहिया उलटी दिशा में शार्ट कट लेते हुए तथा इसी तरह दुकानों से सटकर भी उलटी दिशा  में 2, 3, व 4 पहिया वाहन बे रोक टोक चलते रहते हैं। याने  डिवाइडर के दोनों तरफ 3 - 3 ओर बहता यातायात। कुल छः दिशाओं में। इन के अलावा आज के वयस्क और अल्प वयस्क युवा बहते ट्रैफिक के आगे से, क्रिस -क्रॉस, साइड से 90* कोण पर अचानक  बाएं से दायें  या दायें से बाएं कब और कैसे निकल जाते हैं ये भी किसी हैरत-अंगेज़ कारनामे से काम नहीं है। जिन्हे देखकर कोई अचंभित होता है, कोई गुस्सा होता है, कोई घबरा जाता है तो कोई इन से बचने के चक्कर में अपना संतुलन खो बैठता है या गिर कर हाथ पैर तुड़ा लेता है। जिसके परिणाम स्वरुप हड्डियों के फ्रेक्चर, हड्डी विशेषज्ञ  व हड्डी अस्पतालों की भी दिन दूनो बढ़ोतरी हो रही है। और जो इन सबसे बचता बचाता सही सलामत अपने ठिकाने पहुँच जाता है वह अपने आपको भाग्यशाली और  स्मार्ट नागरिक समझता है। 
 डॉ अशोक मित्तल dr.ashokmittal.blogger.com/blogger.g
प्रस्तावित 

Saturday, September 26, 2015

के ई एम अस्पताल मुंबई के डाक्टरों की पिटाई ???



के ई एम अस्पताल मुंबई के डाक्टरों की पिटाई ???
अस्पताल के आई सी यू  में बेड खाली नहीं था तो मरीज को जनरल वार्ड में भर्ती करने पर कल तीन डाक्टरों की सरियों से उसके परिजनों पिटाई कर दी।  टीवी पर चिकित्सकों के शरीर पर सरियों के निशान दिखाए गए। दुःख व अफ़सोस के अलावा प्रश्न ये है की अस्पतालों में साधनों की कमी का जिम्मेदार कौन है ??
डॉ अशोक मित्तल  25/09/2015 

क्या देश की सरकारें नहीं चाहती की अस्पताल सुचारू रूप से चलें? क्या अस्पताल और किसी अन्य सरकारी दफ्तर में कोई है। जहाँ आप किसी भी कर्मचारी पर हाथ उठाना तो दूर, जोर से भी बोल दें तो सरकारी काम काज में बाधा जैसी धाराओं में अंदर जाने का खतरा मंडराता रहता है। चूँकि ऐसा कोई डर अस्पतालों में तोड़फोड़, मारपीट करने वालों को नहीं है, इसी लिए आये दिन डॉक्टर्स पिटते व गालियां खाते रहते हैं। 
डॉ अशोक मित्तल  27/09/2015  

Friday, September 25, 2015

अस्पतालों में साधनों की कमी का जिम्मेदार को है ??

के ई एम अस्पताल मुंबई के डाक्टरों  पिटाई ???
अस्पताल के आई सी यू  में बेड खाली नहीं था तो मरीज को जनरल वार्ड में भर्ती करने पर कल तीन डाक्टरों की सरियों से मरीज के परिजनों पिटाई कर दी।  टीवी पर चिकित्सकों के शरीर पर कल सरियों के निशान देख कर दुःख  अफ़सोस के अलावा प्रश्न ये है की अस्पतालों में साधनों की कमी का जिम्मेदार को है ??
डॉ अशोक मित्तल